अब जी नहीं करता
किसी के कंधे पे सर रख के रोऊ मैं...
कोई मेरा हाथ थामे
मुझे अपना कहे
अब जी नहीं करता........
कोई फर्क भी तो नहीं पड़ता अब
कोई फ़ायदा भी तो नहीं है
अब सारे रिश्ते जिस्मानी ही तो रह गए हैं
इसलिए अब मन नहीं करता...
किसी के दामन का सहारा लूँ
किसी को अपना कहूं.....
एक काँटा चुभा दिल में,
आह भी निकली
दर्द भी हुआ
मगर.......
हर सिसकी रेत में पड़ी बूँद की तरह
कहीं खो गई ..........
ज़िन्दगी एक खुली किताब तो थी ही
अब उस किताब के
कुछ खाली पन्ने ही बचे हैं ............
अब तो दर्द को भी दर्द नहीं होता
एक छोर से दूसरे छोर तक
सब खाली ही खाली है.........
और भरने वाला कोई नहीं....
बेरंग सी हो गई है ज़िन्दगी अब तो
लगने लगा है कोई साथ नहीं है मेरे .........
अब वाकई जी नहीं करता.....................................
Wednesday, February 25, 2009
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2 comments:
जी नही करता कि जी को करवाना छोड दिया है??
pata nahi aisa hi samajh lo ...
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