Sunday, March 1, 2009

मेरा साया




कभी दिखता है.......
कभी ओझल सा हो जाता है,
कभी लगता है भ्रम सा .......
कभी असल सा हो जाता है,
क्या कोई अपना आया है ......
या फ़िर वो मेरा साया है ...........................

कभी रहता है दिल में...
कभी आँसू बन के बह जाता है,
कभी खामोश रहता है...
कभी मासूमियत से कह जाता है,
क्या सच कोई मेरे पास आया है .....
या फ़िर वो मेरा साया है .........................

कैसे समझूंगी मैं ...
कौन समझायेगा अब,
जो मुझमें था कभी ...
वो बस एक ख्वाब है अब,
क्या मुझसे बतियाने आया है....
या फ़िर वो मेरा साया है ........................

मैं जिसे छू नहीं सकती,
प्यार नहीं कर सकती,
अपना नहीं कह सकती,
देख नहीं सकती,
कल्पना भी नहीं सकती,
वो मुझे बुलाने आया है...
शायद ..... वो मेरा साया है...
हाँ वो मेरा साया ही है .....................................

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